'हम सबसे बढ़कर है संगीत'
१२ दिसम्बर २०१२उस्ताद शुजात हुसैन खान का कहना है कि पंडित रविशंकर ने भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा को बहुत ही प्रभावित किया है. उस्ताद विलायत खान के बेटे शुजात हुसैन खान खुद ग्रैमी एवार्ड के लिए नामांकित किए जा चुके हैं.
डॉयचे वेलेः पंडित रविशंकर की मौत से कितना बड़ा नुकसान हुआ है. खबर सुनकर आपकी प्रतिक्रिया कैसी रही?
शुजात हुसैन खानः हमने बहुत कुछ खोया है. हर उद्योग, कारोबार, संगीत, फिल्म कुछ स्तंभों पर खड़ा होता है जो अपने वक्त के दिग्गज होते हैं. वे शास्त्रीय संगीत के स्तंभ थे. पिछले 10-15 सालों में वे सार्वजनिक तौर पर बहुत कम बाहर आए, लेकिन एक पिता के तौर पर वह हमारी पीढ़ी के लिए अहम थे. आज वह यहां नहीं है तो हमें अनाथ जैसा महसूस हो रहा है. वह एक बड़े संगीतकार थे, एक बड़े उस्ताद और हमें उनकी कमी बहुत खलेगी.
एक सितार वादक की हैसियत से क्या आप हमें बता सकते हैं कि पंडित रविशंकर का सबसे बड़ा योगदान कौन सा था?
हमारे परिवार में संगीत रविशंकर के परिवार से अलग है. हम एक ऐसे परिवार से हैं जिसने गायकी अंग के साथ काम किया. (एक ऐसी शैली जिसमें कोशिश की जाती है कि सितार की आवाज इंसानी आवाज के करीब हो). तो संगीत की नजर से हमारे व्यक्तित्व अलग थे, हालांकि यह सब संगीत का ही हिस्सा है. उनका सबसे बड़ा योगदान था भारतीय शास्त्रीय संगीत को पश्चिम लाना और दुनिया भर में इसे विख्यात करना.
आप अंग्रेजी म्यूजिक बैंड बीटल्स की बात कर रहे हैं...
मुझे लगता है कि बीटल्स के साथ उनके काम को रविशंकर ज्यादा गर्व से नहीं देखेंगे. वह एक अलग वक्त था. जॉर्ज हैरिसन उनके पास आए लेकिन बाद में रविशंकर को लगा कि वह वुडस्टॉक जैसे संगीत महोत्सवों में ऐसे लोगों के सामने संगीत पेश कर रहे थे, जिन्होंने ड्रग्स ली थीं. बाद में उन्हें समझ में आया कि कुछ ऐसे भी लोग हैं जो उन्हें और उनके संगीत को गंभीरता से ले रहे हैं.
क्या उन्हें वाकई यह वाली बात बुरी लगी?
बुरी तो नहीं लगी, लेकिन उन्हें समझ में आया कि वह यह नहीं करना चाहते थे. कोई भी संगीतकार चाहेगा कि लोग उसके संगीत को समझें और उसका मजा उठाएं, यह नहीं कि लोग ड्रग्स लें और आप उनके सामने जो पेश कर रहे हैं उसे स्वीकार कर लें.
जब आप बाहर कंसर्ट देते हैं तो क्या आपको भी ऐसा लगता है?
नहीं, मेरी किस्मत अच्छी है कि जब तक मैं बाहर निकला तब तक लोगों को भारतीय संगीत के बारे में पता चल गया था. वह यह नहीं सोच रहे थे कि कोई गुरू अगरबत्ती जलाकर कुछ बजाएगा और आप उसके चारों तरफ झूमेंगे. उन्हें पता चल गया था कि इस संगीत में मेहनत लगती है, इसमें परंपरा है, एक विरासत है और यह गंभीर कला है.
भारत में शास्त्रीय संगीत का भविष्य कैसा है?
मेरे पास बहुत प्रतिभाशाली युवा आ रहे हैं, सितार और सरोद वादक. संगीत हम सब से बढ़कर है. संगीतकार संगीत को आगे ले जाता है, उसका मजा उठाता है और दुनिया को संगीत का तोहफा देता है. आजकल के युवाओं के साथ यह पहले से और ताकतवर हो गया है. संगीत को परिपक्व होने में वक्त लगता है तो आपको तीस चालीस होने का इंतजार करना होगा. लेकिन संगीतकारों की एक बहुत अच्छी पीढ़ी आ गई है.
इंटरव्यूः मानसी गोपालकृष्ण
संपादनः महेश झा