कभी रूस में सम्मानित रहे दार्शनिक का म्यूजियम रूस ने तोड़ा
१४ मई २०२२रूस के मिसाइल हमलों में नष्ट कर दिए गए ग्रिगोरी स्कोवोरोदा राष्ट्रीय साहित्यिक स्मारक संग्रहालय को साल 1972 में कवि और दार्शनिक ग्रिगोरी स्कोवोरोदा की विरासत का सम्मान करने के लिए बनाया गया था. इस हमले में एक व्यक्ति घायल हो गया. कई पांडुलिपियों समेत संग्रहालय की कीमती वस्तुओं को पहले ही वहां से निकाल किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया गया था. इस वजह से स्कोरोवोडा की एक मूर्ति भी हमले में नष्ट होने से बच गई. यह संग्रहालय यूक्रेन के दूसरे बड़े शहर खार्कीव के बाहरी हिस्से में बना था. ग्रिगोरी स्कोवोरोदा अपने जीवन के अंतिम वर्षों में यहीं रहे थे. 9 नवंबर 1794 को उनकी मृत्यु हुई थी.
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने कहा कि यह स्कोरोवोडा की विरासत पर हमला था, "जिन्होंने इंसानों को सिखाया कि जीवन के प्रति सच्चा ईसाई रवैया क्या है और इंसान खुद को कैसे जान सकते हैं.”
हर जगह मौजूद ग्रिगोरी स्कोवोरोदा
दार्शनिक ग्रिगोरी स्कोवोरोदा का पूरे यूक्रेन में बहुत सम्मान है और हर जगह उनका नाम मौजूद है. खार्कीव में उनके नाम पर बना ग्रिगोरी स्कोवोरोदा राष्ट्रीय शैक्षणिक विश्वविद्यालय देश के सबसे पुराने विश्वविद्यालयों में से एक है. साल 1986 में राजधानी कीव के पास पेरियास्लोव में ग्रिगोरी स्कोवोरोदा यूनिवर्सिटी बनाई गई. उनके सम्मान का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि यूक्रेन के पांच सौ रिव्निया के नोटों पर स्कोवोरोदा की तस्वीरें अंकित रहती हैं.
यूक्रेन के सुकारात
स्कोरोवोडा का जन्म दिसंबर 1722 में चोरनुखी में हुआ था, जो अब यूक्रेन में है, लेकिन उस वक्त वह रूसी साम्राज्य का हिस्सा था. 1738 के बाद से, उन्होंने कीव-मोहिला अकादमी में अध्ययन किया और बाद में खुद उन्होंने लैटिन, ग्रीक और जर्मन की पढ़ाई की और फिर पढ़ाया भी. वो क्लासिकल दार्शनिक साहित्य में भी रुचि रखते थे. स्कोवोरोदा शुरू में स्कूल में कविता पढ़ाते थे लेकिन स्कूल प्रशासकों के साथ बहस और मतभेद के बाद उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया और फिर वो एक प्राइवेट ट्यूटर की तरह काम करने लगे.
साल 1760 में, वो खार्कीव के एक कॉलेज में कविता के प्रोफेसर बने. बाद में, उन्होंने ग्रीक भाषा और नीतिशास्त्र पढ़ाया. साल 1769 तक उन्होंने खुद को अपने दार्शनिक लेखन के लिए समर्पित कर दिया और अध्यापन से संबंधित सभी गतिविधियों से खुद को अलग कर लिया. इस दौरान उन्होंने पूरे यूक्रेन की यात्रा की और आखिरकार खार्कीव में बस गए और अपने अंतिम समय तक उसी घर में रहे, जिसे पिछले दिनों रूसी हमले में नष्ट कर दिया गया.
कहा जाता है कि 1758 में एक सपने के बाद स्कोवोरोदा सभी भौतिक चीजों के पीछे आध्यात्मिक वजह ढूंढ़ने की प्रवृत्ति से असहमत होने लगे. इस समय तक स्कोवोरोदा ने काफी यात्राएं कर ली थीं और रूसी साम्राज्य में उन्हें भी दर्शन के प्रसार के दौरान कई समस्याओं का सामना करना पड़ा, ठीक उसी तरह जैसे कि ग्रीस में दार्शनिकों को करना पड़ा था. ग्रीस यानी यूनान को दर्शन का उद्गम स्थल कहा जाता है. आज स्कोवोरोदा को यूक्रेन के सुकरात के रूप में जाना जाता है. उन्होंने अपने एक बयान में भी कहा था कि वो ‘रूस के सुकरात' बनना चाहते थे.
'एक दिलचस्प और स्वतंत्र इंसान'
डीडब्ल्यू से बातचीत में बर्लिन की 'फ्री यूनिवर्सिटी' में पूर्वी यूरोपीय संस्थान के स्कॉलर गुसान गुसेनोव कहते हैं, "वास्तव में वो कोई बहुत महत्वपूर्ण दार्शनिक नहीं थे. उनकी पुस्तकें इतनी महत्वपूर्ण नहीं थीं, लेकिन उनमें भाषण देने की कला थी और इसके बल पर उन्हें काफी प्रसिद्धि मिली. उनके दार्शनिक योगदान कुछ बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जाते हैं.”
लेकिन उन्होंने जीवन भर अपनी छाप जरूर छोड़ी. गुसेनेव कहते हैं, "वो एक दिलचस्प और एक स्वतंत्र इंसान थे. एक दुर्लभ व्यक्तित्व, 18 वीं शताब्दी के रूस में स्वर्ग के पक्षी की तरह.” गुसेनोव ये भी बताते हैं कि उस समय इतनी यात्रा करना आम नहीं था. सिर्फ रूसी साम्राज्य के भीतर ही नहीं, बल्कि वियना और बुडापेस्ट और शायद इटली तक भी वो गए.
अपनी इन यात्राओं के जरिये से स्कोवोरोदा अपने छात्रों के लिए रूस और यूरोप के बीच न सिर्फ प्रोफेसर बल्कि एक मध्यस्थ की हैसियत भी रखते थे. गुसेनोव कहते हैं, "वो मनुष्यों में रुचि रखते थे और हमेशा एक शिक्षार्थी ही बने रहे.”
खुशी के लिए कोशिशें
खुद में स्वतंत्रता और खुशी खोजना, स्कोवोरोदा के प्रमुख विषय थे.
ये दोनों ही चीजें ऐसी थीं जो ईश्वर के साथ राबता हासिल की जानी थीं. लेकिन स्कोवोरोदा को चर्च के साथ कुछ समस्याएं थीं. गुसेनोव कहते हैं, "उस समय, चर्च उन्हें असंतुष्ट मानता था क्योंकि उन्होंने धार्मिक रचनाओं को अस्वीकार कर दिया था. यही कारण है कि उनके तकरीरों में संघर्ष दिखता था.” स्कोवोरोदा ‘स्वतंत्रता और मजाक पसंद शांतिप्रिय इंसान' थे. और ये बातें चर्च की सख्तियों से मेल नहीं खाती थीं.
सोवियतों ने उन्हें नहीं माना 'खतरनाक कवि'
गुसान गुसेनोव रूसी साम्राज्य के पतन और सोवियत संघ के निर्माण के बाद के समय का वर्णन करते हैं, जिनके गणराज्यों की अपनी राष्ट्रीय भाषाएं, कलाकार और लेखक थे. वो कहते हैं, "इन गणराज्यों में से, उन ऐतिहासिक व्यक्तियों की स्मृतियां संरक्षित थीं, जो विवादित नहीं थे.”
वो कहते हैं, "स्कोरोवोडा ने कभी भी रूसी साम्राज्य की आलोचना नहीं की और उन्होंने ज्यादातर रूसी भाषा में ही लिखा था. इसलिए वह सोवियत संघ को मंजूर थे. सोवियत संघ में उन्हें एक खतरनाक कवि के रूप में नहीं देखा गया.”
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पिछले दिनों यह दिखाने की कोशिश की कि यूक्रेन की संस्कृति वास्तव में रूस की ही संस्कृति है, और इसके लिए उन्होंने ऐतिहासिक व्यक्तियों को भी शामिल किया. पिछले साल "रूसियों और यूक्रेनियनों की ऐतिहासिक एकता” नामक एक लेख में उन्होंने स्कोवोरोदा और तारास शेवचेंको जैसी शख्सियतों के बारे में लिखा था. युद्ध के दौरान इन दोनों की मूर्तियां भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई हैं.
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गुसेनोव कहते हैं, "उनके काम हमारी साझा साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत हैं. यूक्रेन को 'छोटा रूस' के तौर पर जाना जाता था लेकिन इस पहचान को लंबे समय तक दबा दिया गया था. उसी यूक्रेन में स्कोवोरोदा ‘आजादी से प्रेम' के एक महत्वपूर्ण प्रतीक हैं.”
गुसेनोव कहते हैं कि यही वजह है कि म्यूजियम पर बमबारी की घटना को बहुत से लोग कुछ इस तरह महसूस कर रहे हैं जैसे ये उनके देश की आत्मा पर किया गया हमला हो. यूक्रेन पर रूसी हमले की शुरुआत के बाद से, अब तक वहां 200 से ज्यादा सांस्कृतिक धरोहर स्थलों को नुकसान पहुंचा है.
रिपोर्ट- टोरस्टेन लांड्सबेर्ग